हिमालय के मठों में समय को रोकने वाले महात्मा भी तपस्या लीन हैं

परम पूज्य सद्गुरुदेव श्रीराहुलेश्वरानंद जी की पुस्तक से उद्धत विभिन्न कार्यो को मैं पाठकों के समक्ष रख रहा हूं जिन्हें पढ कर आप दांतों तले अंगुली दबा लेगे।
गुरु के प्रति पूर्णतया समर्पित थेः-KURMANCHAL 6 HILLS OM
परम पूज्य सद्गुरुदेव श्रीराहुलेश्वरानंद जी ने लिखा है कि जब मैं आठ महाविद्या सिद्ध कर नवी महाविद्या प्राप्त करने हेतु स्वामी निखिलेश्वरानंद जी के गृहस्थ रुप डॉ० नारायण दत्त श्रीमाली जी के यहां गया तो मैं संयासी वस्त्रों में था। मुझे त्रिजटा महाराज ने सीधे नागार्जुन पर्वत से भेजा था। मैं थोडा डरा-सहमा सा था क्योंकि त्रिजटा गुरुदेव ने मुझे जिस व्यक्तित्व का परिचय दिया था मैं उसका साक्षात्कार करने जा रहा था। वे अंदर आफिस में बैठे हुए थे उन्होंने मुझे देखा, मानसिक रुप से मैंने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने मेरा प्रणाम स्वीकार किया। लेकिन इसके बाद गुरुदेव ने तीन दिनों तक मेरी ओर देखा भी नहीं। उस वक्त जोधपुर में ठण्ड का मौसम था, रात को हड्डियां कंपकपाने वाली ठण्ड होती थी। लेकिन मुझे विश्वास था कि चाहे गुरुदेव मेरी कुछ भी परीक्षा लें मैं उन सब मैं सफल रहूंगा और उनसे दीक्षा प्राप्त करुंगा। मुझे भी घमंड आ सकता था कि मैंने तो आठ महाविद्याएं सिद्ध कर रखी हैं, अनेकों साधनाओं में सिद्धहस्त हूं फिर मैं क्यों रुकूं। मैं क्यों बाहर खडा रहूं और जबकि एक प्रकार से मैं उनका गुरुभाई भी था क्योंकि सच्चिदानंद गुरुदेव से मैं दीक्षा ले चुका था। फिर भी मैं एक नवोदय शिष्य की तरह खडा था कि कब वह मुझ पर अपनी एक दृष्टि डालेगे। मेरे मन में गुरुदेव से दीक्षा देने के सिवा और कोई भाव नहीं आया। गुरुदेव ने अपनी करुणामय दृष्टि से मेरी ओर देखा और मुझे अपने साथ लेकर चले गये तो उस क्षण मैं उनके ममत्व से पूरी तरह भीग गया था।
२- सिद्धाश्रम
सिद्धाश्रम एक अत्यंत उच्चकोटि की भावभूमि पर एक अत्यन्त सिद्ध आश्रम है जो कई वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसके एक ओर कैलाश मानसरोवर है दूसरी ओर ब्रहम सरोवर है और तीसरी ओर विष्णुतीर्थ है। इन तीनों पुण्य स्थलियों के बीच यह सिद्धाश्रम स्थित है। स्वयं विश्वकर्मा ने ब्रह्मादि के कहने पर इस आश्रम की रचना की।
परमहंस स्वामी सच्चिदानंद प्रभु जिनकी आयु हजारो-हजारों वर्षो की है और जो समस्त गुरुओं के गुरु हैं वे इस श्रेष्ठतम आश्रम के संस्थापक, संचालक एवं नियंता हैं। सच्चिदानंद जी के बारे में स्वयं ब्रह्मा ने कहा है कि वे साक्षात ब्रह्मा का मूर्तिमय पुंज है। भगवान शिव ने उनको आत्मस्वरुप कहा है और सभी देवी-देवता उनकी एक झलक पाने को लालायित रहते हैं। सिद्धाश्रम में चारों ओ दिव्य स्फटिक शिलाएं देखने को मिलती हैं जिस पर हजारों वर्ष के योगी साधनारत एवं समाधिस्थ हैं। वहां जगह-जगह पर दिव्य कल्पवृक्ष देखने को मिलते हैं जिनका विभिन्न शास्त्रों में वर्णन है। इनके नीचे बैठकर व्यक्ति जो इच्छा करता है वह पूर्ण होती ही हैं।
सिद्धाश्रम की आयु अत्यधिक शीतल एवं संगीतयुक्त है। उसमें एक थिरकन है, एक गुनगुनाहट है, एक मधुरता है, एक अद्वितीयता है। वहां देव संगीत निरंतर गुंजरित होता रहता है एवं उसको सुनकर मन में एक तृष्टि का अहसास होता है। कहीं कहीं उच्चकोटि के योगी यज्ञ सम्पन्न करते दिखाई देते हैं और सारा वातावरण उस यज्ञ की पवित्र धूम से आप्लावित रहता है। वहां सभी अपनी-अपनी क्रिया में संलग्न रहते हैं। वास्तव में ही वहां पहुंचने पर शरीर एवं हृदय ऐसे आनंद से भर जाता है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
इस सिद्धाश्रम का सबसे अधिक आकर्षण का केन्द्र है यहां की सिद्धयोगा झील। कई कि०मी० विस्तार में फैली हुई यह अद्भूत झील कायाकल्प के गुणों से युक्त है। ८० साल का व्यक्ति भी यदि इसमें स्नान कर लेता है तो वह सौन्दर्य से परिपूर्ण कामदेव के समान हो जाता है। उसके सारे मानसिक एवं दैहिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं और वह पूर्ण आरोग्य को प्राप्त करता है। इस झील में कई स्फटिक नौकाएं हैं जिसमें साधक जन एवं देवागंनाएं विहार करते दिखाई देते हैं।
Swamiji12वास्तव में ही सिद्धाश्रम काल से परे कालजयी आश्रम है। यहां पर न सुबह होती है न शाम होती है और न ऋतु परिवर्तन ही होता है। यहां पर सदैव वसंत ऋतु का ही मौसम रहता है एवं सदैव ही शीतल चॉदनी सा प्रकाश बिखरा रहता है। योगियों के शरीर से जो आभा प्रकाशित होती है उससे भी यहां प्रकाश फैला रहता है। इस कालजयी आश्रम में किसी की मृत्यु नहीं होती है। हर कोई सौंदर्यवान, तरुण एवं रोग रहित रहता है। यहां पर उगी वनस्पति, पुष्प एवं कमल भी कभी मुरझाते नहीं है। सतयुग, त्रेताकालीन, द्वापरकालीन अनेकानेक दिव्य विभूतियां इस दिव्य आश्रम में आज भी विद्यमान हैं। राम, बुद्ध, हनुमान, कृष्ण, महावीर, गोरखनाथ, सप्त ऋषिगण, जिनका नाम लेना ही इस पूरे जीवन को पवित्र और दिव्य बनाने के लिए काफी है। यहां पर सशरीर विद्यमान हैं। परमहंस त्रिजटा जी महाराज, महावतार बाबा जी आहदि इस दिव्य आश्रम की श्रेष्ठ विभूतियां हैं। जगह-जगह पर अनेकानेक योगी तांत्रिक इन महापुरुषों का सत्संग लाभ करते हुए देखे जा सकते हैं। अगर यह भूमि तप भूमि हैं, साधना या तपस्या भूमि हैं तो यह सही अर्थो में सौन्दर्यभूमि भी है। समस्त ब्रह्माण्ड का सौन्दर्य ही मानों इस आश्रम में समाया हुआ है। सिद्धाश्रम देवताओं के लिए भी दुर्लभ एवं अन्यतम स्थान है, जिसे प्राप्त करने के लिए उच्चकोटि के योगी भी तरसते रहते हैं। प्रत्येक साधक अपने मन में यह आकांक्षा लिये रहता है कि उसे एक बार सिद्धाश्रम प्रवेश का अवसर मिल जाएं। परमहंस सच्चिदानंद जी के प्रमुख शिष्य युगपुरुष परमहंस निखिलेश्वरानंद जी इस आश्रम के प्राण हैं। आज जो भी नवीनताएं एवं रोचक बदलाव इस आश्रम में हुए हैं वे सब उन्हीं के प्रयत्नों से संभव हो सका है। वास्तव में बिना निखिलेश्वरानंद जी के तो सिद्धाश्रम की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यही कारण है कि सिद्धाश्रम को निखिल भूमि के नाम से भी पुकारा जाता है।
पर इस आश्रम को स्थूल नेत्रों से नहीं देखा जा सकता पर सामान्य व्यक्ति भी सिद्धाश्रम जा सकता है। इसके लिए तीन कसौटियां हैं। प्रथम उसने दस महाविद्याओं में से चार महाविद्याएं सिद्ध की हो या उसने षटचक्र भेदन करके सहस्रार में कुण्डलिनी को अवस्थित कर लिया हो या फिर तीसरा मार्ग है किसी श्रेष्ठतम सद्गुरु की कृपा से सिद्धाश्रम जाना। पर हर कोई सन्यासी या हर कोई गुरु यह नहीं कर सकता। हरिद्वार, इलाहाबाद, वाराणसी में बैठे संयासी किसी को सिद्धाश्रम नहीं ले जा सकते हैं। शिष्य को वे ही सद्गुरु सिद्धाश्रम ले जा सकते हैं जो स्वयं सिद्धाश्रम की परम्परा से जुडे हैं जो सिद्धाश्रम सशरीर गये हुए हैं और वहां से वापस भी आए हैं। जिनका आवागमन हैं सिद्धाश्रम में, जिन्होंने दसों महाविद्यां सिद्ध की हैं एवं जिनका सहस्रार पूर्ण जागृत हैं और जो ब्रहमाण्ड भेदन में पूर्ण सिद्धहस्त ह केवल और केवल मात्र वे ही अपने शिष्य को प्रवेश लेने के बाद सिद्धाश्रम ले जा सकते हैं आप सबका भाग्योदय हो। आपमें सिद्धाम जाने की ललक उठे, आपको ऐसे गुरु प्राप्त हो आप उन्हें पहचान सकें एवं उनकी परीक्षाओं में सफल होते हुए सिद्धाश्रम जा सके, यही मेरी कामना है।
क्रम सं. ३
निखिलेश्वरानंद जी महाराज का नाम अपने आप में ही देवगंगा की तरह पवित्र, उज्जवल एवं शीतलता का प्रतीक है। मात्र उनके संसर्ग, साहचर्य एवं सम्फ से ही जीवन की पूर्णता का आभास अनुभव होने लगता है। पूज्य गुरुदेव डा० नारायण दत्त श्रीमाली जी परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी सही अर्थो में पूर्ण योगीश्वर हैं जिन्हें कई-कई हजार वर्षो की आयु का पूर्ण ज्ञान है। एक ही जीवन जीते हुए उन्होंने प्रत्येक युग को देखा। द्वापर को, त्रेता को और इससे भी पहले वैदिक काल को। उन्हें वैदिक ऋचाएं ज्ञात हैं, द्वापर की एक-एक घटना स्मरण है, त्रेता के एक-एक क्षण के साक्षी रहे हैं।
परम पूज्य सद्गुरुदेव श्रीराहुलेश्वरानंद जी ने लिखा है कि पहले का नहीं कह सकता पर २००० वर्षो का साक्षी भूत शिष्य तो मैं भी रहा हूं, और इन २००० वर्षो में उन्हें कैसे चिर यौवनवान, चिर नूतन एक संयासी के रुप में देखा है। यह अलग बात है कि इस दौरान उन्होंने कई रुप लिये, कई रुपों में प्रस्तुत हुए। उन्होंने जो साधनाएं सम्पन्न की है वे अपने आप में ही अद्वितीय हैं। अगम्य ह हजारों-हजार वर्ष के योगी भी उनके सामने नतमस्तक रहते हैं क्योंकि वे योगी उनके आभ्यतंरिक जीवन एवं भावनाओं से परिचित हैं। वे जानते हैं कि यह व्यक्तित्व अनूठा है, अद्वितीय है, इसके पास ज्ञान एवं साधनाओं का इतना विशाल भण्डार है कि वे योगी कई सौ वर्षो तक उनके साहचर्य में रहकर भी उसे पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सकते। सम्पूर्ण वेद एवं शास्त्र उन्हें स्मरण हैं और जब वे बोलते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं ब्रह्मा चारों मुख से वेद उच्चारित कर रहे हैं। मैंने उन्हें ब्रह्म स्वरुप को देखा है उनके विष्णु स्वरुप को देखा है, उनके रुद्र स्वरुप को देखा है। उनके रौद्र स्वरुप का भी साक्षी रहा हूं। मैंने उनके जीवन के हर क्षण को जिया है और यह अनुभव किया है कि वास्तव में ही योगीश्वर निखिलेश्वरानंद जी इस समस्त ब्रह्माण्ड की अद्वितीय विभूति हैं और इस बात का साक्षी मैं ही नहीं अपितु सैकडों योगी, ऋषि एवं मुनि रहे हैं। सिद्धाश्रम का हर योगी इस बात को महसूस करता है ंकि निखिलेश्वरानंद जी नहीं हैं तो यह सिद्धाश्रम भी नहीं है। क्योंकि निखिलेश्वरानंद जी इस सिद्धाश्रम के कण-कण मैं व्याप्त हैं। वे किसी को दुलार देते हैं, किसी को सहलाते हैं। किसी को झिडकते हैं तो केवल इसलिए कि वह कुछ सीख लें। केवल इसलिए कि वह कुछ समझ लें, केवल इसलिए कि वह जीवन में पूर्णतया प्राप्त कर लें और सभी ऋषिगण उनके पास बैठकर अत्यंत शीतलता का अनुभव करते हैं। ऐसा लगता है कि एक साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ बैठे हो।
वे अद्वितीय युग पुरुष हैं हो सकता है कि वर्तमान काल उनको समझ नहीं सके क्योंकि एक अनिर्वचनीय व्यक्तित्व को काल अपनी बाहों में बॉध नहीं सकता, समय उनकी गाथा नहीं गा सकता वह तो जो उनके साथ रहा है, जो साक्षी भूत रहा है वहीं समझ सकता है क्योंकि उन्होंने तो कई रुपों में जन्म लिया, शंकराचार्य के रुप में, बुद्ध के रुप में, महावीर के रुप में, योगियों के रुप में और सभी रुपों में वे अपने-आप में उच्चतम रहे।
कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जिस प्रकार अपना विराट स्वरुप दिखाया, उससे भी उच्च एवं अद्धितीय विराट स्वरुप मैंरे अलावा हजारों संयासियों ने उनका देखा है और अहसास किया है कि वास्तव में ही वे १०८ कला पूर्ण एवं अद्वितीय व्यक्तित्व हैं। एक युग पुरुष हैं जो एक विशेष उद्देश्य के लिए इस पृथ्वी ग्रह पर आए हैं।
वे सिद्धाश्रम के प्राण हैं। जब भी वे सिद्धाश्रम में आते हैं तो हजारों साल की आयु प्राप्त योगी-यति भी अपनी तपस्या बीच में ही भंग करके खडे हो जाते हैं। उनके चरणों को स्पर्श करने के लिए रेलम-पेल मच जाती हैं। चाहे साधक-साधिकाओं हो, चाहे संयासी-संयासिनियां हो, चाहे योगी हो, चाहे ऋषिगण हो या अप्सराएं हो, सभी में एक ही ललक, एक ही इच्छा, आकांक्षा होती है कि स्वामी निखिलेश्वरानंद जी के चरणों को स्पर्श किया जाए क्योंकि उनके चरणों को स्पर्श करना ही जीवन का सर्वोच्च भाग्य है। वे जिस रास्ते से गुजर जाते हैं जहां-जहां उनके चरण चिन्ह पड जाते हैं। वहां की धूलि उठाकर उच्च कोटि के योगी, संयासी अपने ललाट पर लगाते हैं। अप्सराएं उस माटी से अपनी मांग भरती हैं एवं साधक साधिकाएं उसको चंदन की भांति अपने शरीर पर लगाते हैं।

स्वामी जी लिखते हैं कि वास्तव में ही सिद्धाश्रम इस समस्त ब्रहमाण्ड का आध्यात्मिक चेतना बिन्दु है। ऋषि, योगी, मुनि एवं हजारों हजारों वर्ष की आयु प्राप्त तपस्वी भी मन में यह आस पाले रहते हैं कि जीवन में एक बार भी अगर सिद्धाश्रम के दर्शन हो जाए तो यह हजारों-हजारों वर्ष का जीवन धन्य हो जाए। वास्तव में ही सिद्धाश्रम एवं निखिलेश्वरानंद जी एक दूसरे के पर्याय हैं। निखिलेश्वरानंद जी के आने से पूर्ण सिद्धाश्रम एक ठूठ के समान था यहां कोई हलचल एवं मस्ती नहीं थी। यहां के योगी, तपस्वी पूर्ण रुप से आत्मलीन एवं आत्मकेन्द्रित थे। यहां सभी अपनी-अपनी तपस्या में ही केन्द्रित थे। वहां शांति तो थी पर वह मरघट की शांति थी। निखिलेश्वरानंद जी ने यह सब बदल दिया। उन्होंने साधक-साधिकाओं को परस्पर बात करने की छूट दी। सिद्धयोगा झील में स्फटिक नौकाओं में विहार करने की आजादी दी। सिद्धाश्रम के मुख्य महोत्सवों में किन्नरों से संगीत बजवाया, गंधर्वो का दिव्य गायन करवाया एवं अप्सराओं से नृत्य भी करवाया और सब ऐसा हुआ तो पूरा सिद्धाश्रम एक क्षण रुक सा गया क्योंकि इससे पहले वहां अप्सरादि का नृत्य नहीं हुआ था। इस सबको मर्यादा के विपरीत माना जाता था। आप तो सिद्धाश्रम में आमूल चूल परिवर्तन करना चाहते थे और यह परिवर्तन वहां स्थित ऋषियों एवं मुनियों को असह्य था और जब आपने उर्वशी से एक घंटे तक नृत्य करवाया तो सबकी आंखें परम पूज्य स्वामी सच्चिदानंद जी पर टिकी हुइ थी कि अब वे किसी भी समय कुछ भी कर सकते हैं।
मगर आपने उस दिन छोटे से सारगर्भित शब्दों में यह समझाया कि यदि आंख साफ है, यदि मन में विकार नहीं है तो फिर चाहे नृत्य हो या चाहे संगीत हो वह गलत नहीं है क्योंकि नृत्य एवं संगीत जीवन का एक आवश्यक अंग है। ठीक उसी तरह जिस तरह वेद मंत्र, साधनाएं एवं सिद्धियां हैं। गुरुदेव की आंखें आफ ऊपर टिकी हुई थी और आपने जब कहा- यह मेरी धृष्टता हो सकती है कि मैंने इस पारस्परिक कार्यक्रम में एक नया अध्याय जोडा है और अगर इसके लिए मुझे यहां से जाना भी पडे तो मैं तैयार हूं। मगर मैं जहां तक समझता हूं मैंने शास्त्र एवं मर्यादा के खिलाफ कोई कार्य नहीं किया है, फिर भी गुरुदेव सर्वोपरि हैं और वे जो भी आज्ञा देगे, वह मुझे सहर्ष स्वीकार है।
उस समय अधिकतर ऋषि गुरुदेव स्वामी सच्चिदानंद जी को सुनने के लिए व्यग्र थे और जब उन्होंने कहा- निखिल ने जो कुछ भी परिवर्तन किया है वह शास्त्र मर्यादा के अनुसार किया है तो सभी आश्चर्य युक्त हर्ष से विभोर हो गये। वास्तव में ही उस दिन से सिद्धाम का स्वरुप ही बदल गया। अब वह इन्द्र के नंदन कानन से भी श्रेष्ठ है और देवी-देवता भी वहां आने को तरसते हैं। सिद्धाश्रम में वेदकालीन ऋषि जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, कणाद, भारद्वाज आज भी विद्यमान ह राम, कृष्ण, बुद्ध आदि भी वहां विचरण करते हुए दिखाई दे जाते हैं पर सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि युग पुरुष निखिलेश्वरानंद जी अपने आप में एक अन्यतम विभूति हैं और उन जैसी ऊॅचाई प्राप्त करना असम्भव है। तभी तो आज सिद्धाश्रम में सबसे ज्यादा उन्हीं के शिष्य ह स्वयं सिद्धाश्रम भी ऐसे अद्वितीय युग पुरुष को प्राप्त कर गौरवान्वित हुआ हैं।

उत्तराखण्‍ड के पांच केदार, पांच बद्री, पांच प्रयाग
उत्तराँचल के पांच केदार (पंचकेदार)
१. केदारनाथ
२. तुंगनाथ
३. मदमहेश्वर
४. कल्पेश्वर
५. रुद्रनाथ

उत्तराँचल के पांच बद्री (पंचबद्री)
१. बद्रीनाथ
२. आदिबद्री
३. वृद्धबद्री
४. भविष्यबद्री
५. योगध्यानबद्री

उत्तराँचल के पांच प्रयाग (पंचप्रयाग)
१. विष्णुप्रयाग ( धोलीगंगा + अलकनन्दा )
२. नन्दप्रयाग ( नन्दाकिनी + अलकनन्दा )
३. कर्णप्रयाग ( पिण्डर + अलकनन्दा )
४. रुद्रप्रयाग ( मन्दाकिनी + अलकनन्दा )

हिमालय का एक रहस्यमय मठ जिसके गुरु की आयु है लगभग १४०० वर्ष और उनके शिष्य की आयु है लगभग ४५० वर्ष
कहते हैं हिमालय में बडे-बडे आश्रम हैं। जहां पर आज भी सैकडों साधक अपनी-अपनी साधना में लगे हुए हैं। ऐसे ही इस हिमाच्छादित प्रदेश में अनंत रहस्यों से भरा है एक मठ जिसका नाम है ज्ञानगंज। वैसे तो इस आश्रम की स्थापना एक हजार पांच सौ वर्ष पूर्व हुई थी परन्तु इसको प्रकट करने का श्रेय जाता है बनारस के मायावी या गंधबाबा के नाम से प्रसिद्ध स्वामी श्री विशुद्धानंद परमहंस को। हम हिमालय के जितने अंदर जाएंगे, उतनी हमें नई जानकारियां उपलब्ध होती जाएंगी। देवात्मा हिमालय का वर्णन अवर्णनीय है। महर्षि महातपा की उम्र है लगभग १४०० वर्ष जो अधिकतर निराहार ही रहते हैं। श्री भृगराम परमहंस देव जी लगभग ४५० वर्ष के हैं। इसके अलावा पायलट बाबा का भी कहना है कि वह हिमालय में छह-छह माह निराहार रहते है। हिमालय के रहस्यमय व दिव्य स्वरुप के बारे में उनकी दो पुस्तकें बेजोड हैं।
हिमालय की एक रहस्यमठ मठ के बारे में उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून से चन्द्रशेखर जोशी की प्रस्तुतिः-
हिमालय आदि काल से रहस्यमय रहा है जैसे-जैसे रहस्य की परतें हटती गई, वैसे-वैसे रहस्य और गहराता गया। सदियों से यह प्राणी मात्र को अपनी ओर आकर्षित करता आया है चाहे इसका कारण वहां पाई जाने वाली दिव्य वानस्पतिक संपदाएं हो या हजारों सालों से तपस्यारत साधुाअें की तपस्या स्थली या फिर देवताओं का मनोरम स्थल। गंगा और सिंधु जैसी पवित्र नदियों का उद्गम स्थल भी तो हिमालय ही है। कहते हैं वहां बडे-बडे आश्रम हैं जहां पर आज भी सैकडों साधक अपनी साधना में लगे हुए हैं। ऐसे ही इस हिमाच्छादित प्रदेश में अनंत रहस्यों से भरा है एक मठ, जिसका नाम है ज्ञानगंज। वैसे इस आश्रम की थापना एक हजार पांच सौ वर्ष से भी पहले हुई थी परन्तु इसको प्रकट करने का श्रेय जाता है बनारस के मुगलसराय से गंधबाबा के नाम से प्रसिद्ध स्वामी श्री विशुद्धानंद परमहंस को।
कथा का आरम्भ यहां से शुरु होता है। बिहार के मुगलसरासय से कलकत्ता रोड पर वर्धमान जिला है जिसे कुछ दूर स्थित है बंडूल नामक गांव। जहां पर भोलानाथ नाम के एक १४ वर्षीय बालक को एक दिन अपने घर की सीढी से नीचे उतरते समय एक पागल कुत्ता काट लेता है। काफी इलाज करने पर भी जब वह ठीक नहीं हो पाता है तो सोचता है कि मेरे को तो अब ठीक होना नहीं है तो क्यों न मैं अपने आपको गंगा में समर्पित कर दूं। गंगा नदी के निकट पहुंचता है तो देखते हैं कि वहां पर एक साधु महाराज नदी के बीच में नहा रहे हैं। जब वे डुबकी लगाकर ऊपर उठते हैं तो उनके साथ गंगा नदी का पानी भी उठता है। बालक हतप्रभ देखता रह जाता है। साधु भी उनको देख लेते हैं। साधु उनके निकट पहुंच कर कहते हैं कि तुम्हें तो पागल कुत्ते ने काटा है और तुम्हारा उद्देश्य तो गंगा में अपने को समर्पित करने का था परन्तु अब चिंता की आवश्यकता नहीं है। ठहरों, मैं तुम्हारे लिए दवाई लाकर देता हूं। आसपास कहीं से कोई जडी बूटी लाकर भोलानाथ के मुंह में डालने के बाद सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते ुहुए कहते हैं कि कुछ देर बाद पेशाब होगा, जिसमें से सभी जहर बाहर निकल जाएगा। वास्तव में जहर निकल जाता है और खुश होकर दूसरे दिन वह विनती करता है कि मुझे दीक्षा देकर उफत करें। तब बाबा ने आश्वासन दिया कि मतैं तुम्हारा गुरु नहीं हूं। समय आने पर तुमको गुरु के समक्ष उपस्थित करूंगा।
इस प्रकार समय निकलता गया और लगभग तीन वर्ष बाद मालूम पडा कि एक साधु ढाका में आए हुए ह जब वह नदी में स्नान करते हैं और पानी में डुबकी लगाकर जब ऊपर उठते हैं तो पानी भी साथ में उठता है। बालक समझ जाता है और अपने एक दोस्त हरिपदौ को साथ लेकर व मॉ से अनुमति पाकर उनसे मिलने चल देता है।
अंततः रमुना के एक मठ में उन महापुरुष से साक्षात्कार हुआ तब वह विनती करता है कि हमें भी साथ ले लें व गुरुदर्शन कराकर दीक्षा दिलवा दें। सन्यासी महोदय ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया व दूसरे दिन दोनों की आंखों पर पट्टी बांध कर उन्ह आकाश गमन द्वारा इलाहाबाद के पास विंध्यवासिनी के मंदिर और एक हफ्ते बाद वापस आकर पुनः आकाश गमन द्वारा आश्रम में लाते हैं। आंख से पट्टी हटाने के बाद देखते हैं कि चारों तरफ बर्फ है और सामने एक आश्रम है। पूछने पर मालूम होता है कि यह हिमालय है और इस आश्रम का नाम ज्ञानगंज है।
कथा को संक्षिप्त करते हुए अब उन्हीं के शब्दों में मेरी दीक्षा हुई। दीक्षा गुरु हुई महर्षि महात्मा जिनकी उम्र है लगभग १४०० वर्ष, जो अधिकतर निराहार ही रहते ह उसके बाद मुझे श्री भुगराम परमहंस देव जो कि लगभग ४५० वर्ष के हैं, के समक्ष उपस्थित किया गया। उनका आशीर्वाद भी मिला और बाद में वे मेरे शिक्षा गुरू भी बने। वहां पर तरह तरह के विषय पढाए जाते हैं जैसे सूर्य विज्ञान, चन्द्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, वायु विज्ञान, ज्योतिष, आयुर्वेद, हठयोग, ध्यान योग आदि। इस प्रकार वहां बहुत विषयों का ज्ञान प्रयोगात्मक रुप में दिया जाता है। मेरा भी अध्ययन शुरु हो गया। इन सबमें जो मुख्य विषय था वह है सूर्य विज्ञान, जिसके द्वारा विश्व की किसी भी वस्तु का निर्माण किया जा सकता है। यहां तक कि मृत को जिवित किया जा सकता है। ज्ञानगंज हिमालय के किस भाग में स्थित है, पूछने पर बताया गया कि यह कैलाश पर्वत के पार्श्व में स्थित है। आश्रम दिव्य है। रात्रि के समय स्वतः प्रस्फुटित होता है। जब तक आश्रम में रहते हैं किसी प्रकार की भूख, प्यास की चिंता नहीं सताती। यहां तक कि सांसारिक तृष्णा भी नहीं पडती। वहां तक जाने के लिए जालंधर से गोगा तक बस से एवं गोगा से दो मील पैदल चलना पडता हैं रास्ते में खाने के लिए दही चिवडा बिकता है। आश्रम काफी विस्तृत रुप में है जिसमें सैकडों साधक साधिकाएं अध्ययनरत हैं। आश्रम के नियम बहुत सख्त हैं। पूरे समय ब्रह्मचर्य में रहना पडता है। मुझे जो दिव्य गुरु ले गये थे, उनका नाम स्वामी नीनानंद परमहंस है जो बाद में मेरे गुरु भाई बने। वहां का विज्ञान यहां के विज्ञान से सैकडों वर्ष आगे ह। मैंने वहां पर १४ तक ज्ञानोपार्जन किया। इस प्रकार स्वामी विशुद्धानंद जी ने बनारस आकर मलदहिया रोड पर विशुद्धानंद कानन आश्रम की स्थापना की जो आज भी वहां पर मौजूद है। विशुद्धानंद जी बाज बात पर ज्ञानगंज आश्रम की चर्चा करते रहते थे। वहां पर इस प्रकार के और भी आश्रम व मठ हैं, ऐसा अक्सर बताया करते थे। यह आश्रम स्थूल रुप से होने के बाद भी सूक्ष्म है। गुरुकृपा से रास्ता आसान हो जाता है। आपने वहां कई लोगों को भेजा था, उन सभी की इच्छाएं पूर्ण हुई। वहां गए लोगों के अनुभव बडे रोचक हुआ करते थे। विशुद्धानंद परमहंस के मुख्य शिष्य की भूमिका काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल पं. गोपीनाथ कविराज ने निभाई। ज्ञानगंज आश्रम का लगभग पता तो लगा लिया है और वहां तक जाने के और भी मार्ग है परन्तु कुछ कारणवश जाना कठिन है। चूंकि आज वह स्थान तिब्बती परिसीमा में स्थित है और तिब्बत का चीन के कब्जे में होना एवं चीन से भारत देश के संबंध मधुर न होना आदि कारणों की वजह से वहां जाना मुश्किल प्रतीत होता है। हमारी सरकार इस ओर पहल करें तो हमारे देश के लिए एक नई उपलब्धि होगी। इस प्रकार हम हिमालय के जितने अंदर जाएंगे, उतनी हमें नई जानकारियां उपलब्ध होती जाएगी। देवात्मा हिमालय का वर्णन अवर्णनीय है। हमें हिमालय पुकार रहा है।

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